सूरह अल-क़ियामा शब्द-दर-शब्द हिंदी | रंगकोडित व्याकरण कार्ड, अनुवाद और तजवीद

हिंदी में सूरह अल-क़ियामा (कयामत का दिन) का शब्द-दर-शब्द अध्ययन करें। यह सूरह कयामत के दिन और खुद को धिक्कारने वाली आत्मा (नफ्स लव्वामा) की कसम खाकर शुरू होती है। यह उस दिन का सजीव चित्रण करती है जब लोगों के चेहरे अपने रब की तरफ देखेंगे और कुछ खुशी से चमकेंगे, जबकि कुछ उदास होंगे। इसमें मौत के वक्त की तकलीफ, रूह के निकलने और इंसान के जल्दबाज़ी में दुनिया को चाहने और आखिरत को भूल जाने का ज़िक्र है। यह इंटरैक्टिव अध्ययन गाइड रंग-कोडित व्याकरण कार्ड प्रदान करती है, जिससे आपको इस सूरह के गहरे अर्थ को समझने में मदद मिलेगी।

In the name of God
संज्ञा (Sangya)
क्रिया (Kriya)
अव्यय (Avyay)
لَآ أُقْسِمُ بِيَوْمِ ٱلْقِيَـٰمَةِ
Lā uqsimu biyawmi l-qiyāmah
मैं क़सम खाता हूँ क़ियामत के दिन की।
75:1
अव्यय
لَآ
नहीं (मैं क़सम खाता)
क्रिया
أُقْسِمُ
मैं क़सम खाता हूँ
uq'simu
संज्ञा
بِيَوْمِ
दिन की
biyawmi
संज्ञा
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़ियामत के
l-qiyāmati
وَلَآ أُقْسِمُ بِٱلنَّفْسِ ٱللَّوَّامَةِ
Wa lā uqsimu bin-nafsi l-lawwāmah
और मैं क़सम खाता हूँ उस नफ़्स की जो (बुराई पर) अपने आप को धिक्कारता है।
75:2
अव्यय
وَلَآ
और नहीं (क़सम खाता)
walā
क्रिया
أُقْسِمُ
मैं क़सम खाता हूँ
uq'simu
संज्ञा
بِٱلنَّفْسِ
नफ़्स (आत्मा) की
bil-nafsi
संज्ञा
ٱللَّوَّامَةِ
धिक्कारने वाले
l-lawāmati
أَيَحْسَبُ ٱلْإِنسَـٰنُ أَلَّن نَّجْمَعَ عِظَامَهُۥ
Ayaḥsabu l-insānu allan najmaʿa ʿiẓāmah
क्या इंसान यह समझता है कि हम उसकी हड्डियाँ इकट्ठी नहीं करेंगे?
75:3
क्रिया
أَيَحْسَبُ
क्या वह समझता है
ayaḥsabu
संज्ञा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इंसान
l-insānu
अव्यय
أَلَّن
कि हरगिज़ नहीं
allan
क्रिया
نَّجْمَعَ
हम जमा करेंगे
najmaʿa
संज्ञा
عِظَامَهُۥ
उसकी हड्डियाँ
ʿiẓāmahu
بَلَىٰ قَـٰدِرِينَ عَلَىٰٓ أَن نُّسَوِّىَ بَنَانَهُۥ
Balā qādirīna ʿalā an nusawwiya banānah
क्यों नहीं, हम तो उसकी उंगलियों के पोरों तक को ठीक करने की सामर्थ्य रखते हैं।
75:4
अव्यय
بَلَىٰ
हाँ (बल्कि)
balā
संज्ञा
قَـٰدِرِينَ
हम क़ादिर हैं
qādirīna
अव्यय
عَلَىٰٓ
पर
ʿalā
अव्यय
أَن
कि
an
क्रिया
نُّسَوِّىَ
हम दुरुस्त कर दें
nusawwiya
संज्ञा
بَنَانَهُۥ
उसकी पोर-पोर
banānahu
بَلْ يُرِيدُ ٱلْإِنسَـٰنُ لِيَفْجُرَ أَمَامَهُۥ
Bal yurīdu l-insānu liyafjura amāmah
बल्कि इंसान चाहता है कि वह अपने सामने (के भविष्य) में भी बुराई करता रहे।
75:5
अव्यय
بَلْ
बल्कि
bal
क्रिया
يُرِيدُ
वह चाहता है
yurīdu
संज्ञा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इंसान
l-insānu
क्रिया
لِيَفْجُرَ
कि वह गुनाह करे
liyafjura
संज्ञा
أَمَامَهُۥ
अपने आगे (भविष्य में)
amāmahu
يَسْـَٔلُ أَيَّانَ يَوْمُ ٱلْقِيَـٰمَةِ
Yas'alu ayyāna yawmu l-qiyāmah
वह पूछता है, "क़ियामत का दिन कब आएगा?"
75:6
क्रिया
يَسْـَٔلُ
वह पूछता है
yasalu
संज्ञा
أَيَّانَ
कब
ayyāna
संज्ञा
يَوْمُ
दिन
yawmu
संज्ञा
ٱلْقِيَـٰمَةِ
क़ियामत का
l-qiyāmati
فَإِذَا بَرِقَ ٱلْبَصَرُ
Fa-idhā bariqa l-baṣar
फिर जब आँखें चकाचौंध (फटी की फटी) रह जाएँगी,
75:7
अव्यय
فَإِذَا
फिर जब
fa-idhā
क्रिया
بَرِقَ
चकाचौंध हो जाएगी
bariqa
संज्ञा
ٱلْبَصَرُ
आँख
l-baṣaru
وَخَسَفَ ٱلْقَمَرُ
Wa khasafa l-qamar
और चाँद बेनूर (गहन में) हो जाएगा,
75:8
क्रिया
وَخَسَفَ
और बेनूर हो जाएगा
wakhasafa
संज्ञा
ٱلْقَمَرُ
चाँद
l-qamaru
وَجُمِعَ ٱلشَّمْسُ وَٱلْقَمَرُ
Wa jumiʿa sh-shamsu wal-qamar
और सूरज और चाँद इकट्ठा कर दिए जाएँगे,
75:9
क्रिया
وَجُمِعَ
और जमा किए जाएँगे
wajumiʿa
संज्ञा
ٱلشَّمْسُ
सूरज
l-shamsu
संज्ञा
وَٱلْقَمَرُ
और चाँद
wal-qamaru
يَقُولُ ٱلْإِنسَـٰنُ يَوْمَئِذٍ أَيْنَ ٱلْمَفَرُّ
Yaqūlu l-insānu yawma-idhin ayna l-mafar
उस दिन इंसान कहेगा, "आज भागने की जगह कहाँ है?"
75:10
क्रिया
يَقُولُ
वह कहेगा
yaqūlu
संज्ञा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इंसान
l-insānu
संज्ञा
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
yawma-idhin
संज्ञा
أَيْنَ
कहाँ
ayna
संज्ञा
ٱلْمَفَرُّ
भागने का स्थान
l-mafaru
كَلَّا لَا وَزَرَ
Kallā lā wazar
हरगिज़ नहीं! कोई पनाहगाह (शरणस्थल) नहीं है।
75:11
अव्यय
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
kallā
अव्यय
لَا
नहीं है
संज्ञा
وَزَرَ
पनाहगाह
wazara
إِلَىٰ رَبِّكَ يَوْمَئِذٍ ٱلْمُسْتَقَرُّ
Ilā rabbika yawma-idhin l-mustaqar
उस दिन तुम्हारे रब ही की तरफ़ जा ठहरना है।
75:12
अव्यय
إِلَىٰ
तरफ़
ilā
संज्ञा
رَبِّكَ
तुम्हारे रब के
rabbika
संज्ञा
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
yawma-idhin
संज्ञा
ٱلْمُسْتَقَرُّ
ठिकाना
l-mus'taqaru
يُنَبَّؤُا۟ ٱلْإِنسَـٰنُ يَوْمَئِذٍۭ بِمَا قَدَّمَ وَأَخَّرَ
Yunabba'u l-insānu yawma-idhin bimā qaddama wa akhkhar
उस दिन इंसान को जता दिया जाएगा जो उसने आगे भेजा और जो पीछे छोड़ा।
75:13
क्रिया
يُنَبَّؤُا۟
बता दिया जाएगा
yunabba-u
संज्ञा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इंसान को
l-insānu
संज्ञा
يَوْمَئِذٍۭ
उस दिन
yawma-idhin
अव्यय
بِمَا
उसके बारे में जो
bimā
क्रिया
قَدَّمَ
उसने आगे भेजा
qaddama
क्रिया
وَأَخَّرَ
और पीछे छोड़ा
wa-akhara
بَلِ ٱلْإِنسَـٰنُ عَلَىٰ نَفْسِهِۦ بَصِيرَةٌۭ
Bali l-insānu ʿalā nafsihī baṣīrah
बल्कि इंसान ख़ुद अपने आप को खूब देख रहा होगा (अपने खिलाफ गवाह होगा),
75:14
अव्यय
بَلِ
बल्कि
bali
संज्ञा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इंसान
l-insānu
अव्यय
عَلَىٰ
अपने ही ऊपर
ʿalā
संज्ञा
نَفْسِهِۦ
स्वयं के
nafsihi
संज्ञा
بَصِيرَةٌۭ
एक गवाह (देखने वाला)
baṣīratun
وَلَوْ أَلْقَىٰ مَعَاذِيرَهُۥ
Wa law alqā maʿādhīrah
चाहे वह कितने ही बहाने पेश करे।
75:15
अव्यय
وَلَوْ
और चाहे
walaw
क्रिया
أَلْقَىٰ
वह पेश करे
alqā
संज्ञा
مَعَاذِيرَهُۥ
अपने बहाने
maʿādhīrahu
لَا تُحَرِّكْ بِهِۦ لِسَانَكَ لِتَعْجَلَ بِهِۦٓ
Lā tuḥarrik bihī lisānaka litaʿjala bih
(ऐ नबी!) आप इस (क़ुरआन) को जल्दी (याद) करने के लिए अपनी जुबान न हिलाएँ।
75:16
अव्यय
لَا
न (हिलाएँ)
क्रिया
تُحَرِّكْ
आप हरकत दें
tuḥarrik
अव्यय
بِهِۦ
इसके साथ
bihi
संज्ञा
لِسَانَكَ
अपनी ज़ुबान को
lisānaka
क्रिया
لِتَعْجَلَ
ताकि जल्दी करें
litaʿjala
अव्यय
بِهِۦٓ
इसके साथ
bihi
إِنَّ عَلَيْنَا جَمْعَهُۥ وَقُرْءَانَهُۥ
Inna ʿalaynā jamʿahu wa qurʾānah
बेशक इसका जमा करना और इसका पढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है।
75:17
अव्यय
إِنَّ
बेशक
inna
अव्यय
عَلَيْنَا
हमारे ज़िम्मे है
ʿalaynā
संज्ञा
جَمْعَهُۥ
इसे जमा करना
jamʿahu
संज्ञा
وَقُرْءَانَهُۥ
और इसे पढ़वाना
waqur'ānahu
فَإِذَا قَرَأْنَـٰهُ فَٱتَّبِعْ قُرْءَانَهُۥ
Fa-idhā qaraʾnāhu fattabiʿ qurʾānah
अतः जब हम उसे पढ़ लें, तो आप उसके पढ़ने की पैरवी करें।
75:18
अव्यय
فَإِذَا
फिर जब
fa-idhā
क्रिया
قَرَأْنَـٰهُ
हम इसे पढ़ लें
qaranāhu
क्रिया
فَٱتَّبِعْ
तो पैरवी करें
fa-ittabiʿ
संज्ञा
قُرْءَانَهُۥ
इसके पढ़ने की
qur'ānahu
ثُمَّ إِنَّ عَلَيْنَا بَيَانَهُۥ
Thumma inna ʿalaynā bayānah
फिर इसका स्पष्ट कर देना (समझाना) भी हमारी ज़िम्मेदारी है।
75:19
अव्यय
ثُمَّ
फिर
thumma
अव्यय
إِنَّ
बेशक
inna
अव्यय
عَلَيْنَا
हमारे ज़िम्मे
ʿalaynā
संज्ञा
بَيَانَهُۥ
इसकी व्याख्या
bayānahu
كَلَّا بَلْ تُحِبُّونَ ٱلْعَاجِلَةَ
Kallā bal tuḥibbūna l-ʿājilah
हरगिज़ नहीं, बल्कि तुम लोग दुनिया (जल्द मिलने वाली चीज़) से प्यार करते हो,
75:20
अव्यय
كَلَّا
हरगिज़ नहीं
kallā
अव्यय
بَلْ
बल्कि
bal
क्रिया
تُحِبُّونَ
तुम मुहब्बत करते हो
tuḥibbūna
संज्ञा
ٱلْعَاجِلَةَ
जल्दी मिलने वाली (दुनिया)
l-ʿājilata
وَتَذَرُونَ ٱلْـَٔاخِرَةَ
Wa tadharūna l-ākhirah
और आख़िरत (परलोक) को छोड़ देते हो।
75:21
क्रिया
وَتَذَرُونَ
और तुम छोड़ देते हो
watadharūna
संज्ञा
ٱلْـَٔاخِرَةَ
आख़िरत को
l-ākhirata
وُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۢ نَّاضِرَةٌ
Wujūhun yawma-idhin nāḍirah
उस दिन बहुत से चेहरे तरो-ताज़ा (रौशन) होंगे,
75:22
संज्ञा
وُجُوهٌۭ
बहुत से चेहरे
wujūhun
संज्ञा
يَوْمَئِذٍۢ
उस दिन
yawma-idhin
संज्ञा
نَّاضِرَةٌ
रौशन/तर-ओ-ताज़ा
nāḍiratun
إِلَىٰ رَبِّهَا نَاظِرَةٌۭ
Ilā rabbihā nāẓirah
अपने रब की तरफ़ देख रहे होंगे।
75:23
अव्यय
إِلَىٰ
तरफ़
ilā
संज्ञा
رَبِّهَا
अपने रब की
rabbihā
संज्ञा
نَاظِرَةٌۭ
देखने वाले
nāẓiratun
وَوُجُوهٌۭ يَوْمَئِذٍۭ بَاسِرَةٌۭ
Wa wujūhun yawma-idhin bāsirah
और बहुत से चेहरे उस दिन उदास (बिगड़े हुए) होंगे,
75:24
संज्ञा
وَوُجُوهٌۭ
और बहुत से चेहरे
wawujūhun
संज्ञा
يَوْمَئِذٍۭ
उस दिन
yawma-idhin
संज्ञा
بَاسِرَةٌۭ
उदास/बिगड़े हुए
bāsiratun
تَظُنُّ أَن يُفْعَلَ بِهَا فَاقِرَةٌۭ
Taẓunnu an yufʿala bihā fāqirah
समझते होंगे कि उनके साथ कमर तोड़ देने वाला मामला होने वाला है।
75:25
क्रिया
تَظُنُّ
वे समझेंगे/सोचेंगे
taẓunnu
अव्यय
أَن
कि
an
क्रिया
يُفْعَلَ
किया जाएगा
yuf'ʿala
अव्यय
بِهَا
उनके साथ
bihā
संज्ञा
فَاقِرَةٌۭ
कमर तोड़ देने वाला
fāqiratun
كَلَّآ إِذَا بَلَغَتِ ٱلتَّرَاقِىَ
Kallā idhā balaghati t-tarāqī
हरगिज़ नहीं, जब जान गले की हड्डियों (हँसली) तक पहुँच जाएगी,
75:26
अव्यय
كَلَّآ
हरगिज़ नहीं
kallā
अव्यय
إِذَا
जब
idhā
क्रिया
بَلَغَتِ
वह पहुँच जाएगी
balaghati
संज्ञा
ٱلتَّرَاقِىَ
गले की हड्डियाँ (हँसली)
l-tarāqiya
وَقِيلَ مَنْ ۜ رَاقٍۢ
Wa qīla man rāq
और कहा जाएगा, "है कोई झाड़-फूँक (इलाज) करने वाला?"
75:27
क्रिया
وَقِيلَ
और कहा जाएगा
waqīla
सर्वनाम
مَنْ ۜ
कौन है
man
संज्ञा
رَاقٍۢ
झाड़-फूँक करने वाला
rāqin
وَظَنَّ أَنَّهُ ٱلْفِرَاقُ
Wa ẓanna annahu l-firāq
और वह (मरने वाला) समझ लेगा कि यह विदाई (जुदाई) का वक़्त है,
75:28
क्रिया
وَظَنَّ
और वह यकीन कर लेगा
waẓanna
अव्यय
أَنَّهُ
कि बेशक वह
annahu
संज्ञा
ٱلْفِرَاقُ
जुदाई का समय
l-firāqu
وَٱلْتَفَّتِ ٱلسَّاقُ بِٱلسَّاقِ
Waltaffati s-sāqu bis-sāq
और पिण्डली पिण्डली से लिपट जाएगी,
75:29
क्रिया
وَٱلْتَفَّتِ
और लिपट जाएगी
wal-tafati
संज्ञा
ٱلسَّاقُ
पिण्डली
l-sāqu
संज्ञा
بِٱلسَّاقِ
पिण्डली के साथ
bil-sāqi
إِلَىٰ رَبِّكَ يَوْمَئِذٍ ٱلْمَسَاقُ
Ilā rabbika yawma-idhin l-masāq
उस दिन तुम्हारे रब ही की तरफ़ ले जाया जाना (हाज़िरी) है।
75:30
अव्यय
إِلَىٰ
तरफ़
ilā
संज्ञा
رَبِّكَ
तुम्हारे रब के
rabbika
संज्ञा
يَوْمَئِذٍ
उस दिन
yawma-idhin
संज्ञा
ٱلْمَسَاقُ
चलना/ले जाना
l-masāqu
فَلَا صَدَّقَ وَلَا صَلَّىٰ
Falā ṣaddaqa wa lā ṣallā
तो न उसने (सच्चाई को) सच माना और न उसने नमाज़ पढ़ी,
75:31
अव्यय
فَلَا
तो न
falā
क्रिया
صَدَّقَ
उसने सच माना
ṣaddaqa
अव्यय
وَلَا
और न
walā
क्रिया
صَلَّىٰ
उसने नमाज़ पढ़ी
ṣallā
وَلَـٰكِن كَذَّبَ وَتَوَلَّىٰ
Wa lākin kadhdhaba wa tawallā
बल्कि उसने झुठलाया और मुँह फेर लिया।
75:32
अव्यय
وَلَـٰكِن
बल्कि
walākin
क्रिया
كَذَّبَ
उसने झुठलाया
kadhaba
क्रिया
وَتَوَلَّىٰ
और मुँह फेर लिया
watawallā
ثُمَّ ذَهَبَ إِلَىٰٓ أَهْلِهِۦ يَتَمَطَّىٰٓ
Thumma dhahaba ilā ahlihī yatamaṭṭā
फिर वह अपने घर वालों की तरफ़ अकड़ता (इतराता) हुआ गया।
75:33
अव्यय
ثُمَّ
फिर
thumma
क्रिया
ذَهَبَ
वह गया
dhahaba
अव्यय
إِلَىٰٓ
तरफ़
ilā
संज्ञा
أَهْلِهِۦ
अपने घर वालों के
ahlihi
क्रिया
يَتَمَطَّىٰٓ
अकड़ता हुआ
yatamaṭṭā
أَوْلَىٰ لَكَ فَأَوْلَىٰ
Awlā laka fa-awlā
अफ़सोस है तुझ पर, फिर अफ़सोस! (तबाही है तेरे लिए)
75:34
संज्ञा
أَوْلَىٰ
अफ़सोस/तबाही
awlā
अव्यय
لَكَ
तेरे लिए
laka
संज्ञा
فَأَوْلَىٰ
फिर अफ़सोस
fa-awlā
ثُمَّ أَوْلَىٰ لَكَ فَأَوْلَىٰٓ
Thumma awlā laka fa-awlā
फिर अफ़सोस है तुझ पर, फिर अफ़सोस!
75:35
अव्यय
ثُمَّ
फिर
thumma
संज्ञा
أَوْلَىٰ
अफ़सोस
awlā
अव्यय
لَكَ
तेरे लिए
laka
संज्ञा
فَأَوْلَىٰٓ
फिर अफ़सोस
fa-awlā
أَيَحْسَبُ ٱلْإِنسَـٰنُ أَن يُتْرَكَ سُدًى
Ayaḥsabu l-insānu an yutraka sudā
क्या इंसान यह समझता है कि उसे आज़ाद (बेकार) छोड़ दिया जाएगा?
75:36
क्रिया
أَيَحْسَبُ
क्या वह समझता है
ayaḥsabu
संज्ञा
ٱلْإِنسَـٰنُ
इंसान
l-insānu
अव्यय
أَن
कि
an
क्रिया
يُتْرَكَ
वह छोड़ दिया जाएगा
yut'raka
संज्ञा
سُدًى
बेकार/आज़ाद
sudan
أَلَمْ يَكُ نُطْفَةًۭ مِّن مَّنِىٍّۢ يُمْنَىٰ
Alam yaku nuṭfatan min maniyyin yumnā
क्या वह एक टपकता हुआ वीर्य (नुत्फ़ा) न था?
75:37
अव्यय
أَلَمْ
क्या नहीं
alam
क्रिया
يَكُ
वह था
yaku
संज्ञा
نُطْفَةًۭ
एक नुत्फ़ा (बूँद)
nuṭ'fatan
अव्यय
مِّن
से
min
संज्ञा
مَّنِىٍّۢ
मनी (वीर्य)
maniyyin
क्रिया
يُمْنَىٰ
जो टपकाया जाता है
yum'nā
ثُمَّ كَانَ عَلَقَةًۭ فَخَلَقَ فَسَوَّىٰ
Thumma kāna ʿalaqatan fakhalaqa fasawwā
फिर वह एक लोथड़ा बना, फिर (अल्लाह ने) उसे पैदा किया और उसके अंग दुरुस्त किए।
75:38
अव्यय
ثُمَّ
फिर
thumma
क्रिया
كَانَ
वह हुआ/बना
kāna
संज्ञा
عَلَقَةًۭ
एक जमा हुआ खून
ʿalaqatan
क्रिया
فَخَلَقَ
फिर उसने पैदा किया
fakhalaqa
क्रिया
فَسَوَّىٰ
फिर दुरुस्त किया
fasawwā
فَجَعَلَ مِنْهُ ٱلزَّوْجَيْنِ ٱلذَّكَرَ وَٱلْأُنثَىٰٓ
Fajaʿala min'hu z-zawjayni dh-dhakara wal-unthā
फिर उससे जोड़े बनाए, यानी नर और मादा।
75:39
क्रिया
فَجَعَلَ
फिर उसने बनाया
fajaʿala
अव्यय
مِنْهُ
उससे
min'hu
संज्ञा
ٱلزَّوْجَيْنِ
दो किस्म (जोड़े)
l-zawjayni
संज्ञा
ٱلذَّكَرَ
मर्द (नर)
l-dhakara
संज्ञा
وَٱلْأُنثَىٰٓ
और औरत (मादा)
wal-unthā
أَلَيْسَ ذَٰلِكَ بِقَـٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يُحْـِۧىَ ٱلْمَوْتَىٰ
Alaysa dhālika biqādirin ʿalā an yuḥyiya l-mawtā
क्या वह (अल्लाह) इस पर क़ादिर नहीं कि मुर्दों को जीवित कर दे?
75:40
क्रिया
أَلَيْسَ
क्या नहीं है
alaysa
सर्वनाम
ذَٰلِكَ
वह (अल्लाह)
dhālika
संज्ञा
بِقَـٰدِرٍ
सामर्थ्यवान (क़ादिर)
biqādirin
अव्यय
عَلَىٰٓ
इस बात पर
ʿalā
अव्यय
أَن
कि
an
क्रिया
يُحْـِۧىَ
वह ज़िंदा करे
yuḥ'yiya
संज्ञा
ٱلْمَوْتَىٰ
मुर्दों को
l-mawtā

समापन प्रार्थना (दुआ)

या अल्लाह, हम तेरा गहरा आभार व्यक्त करते हैं कि तूने हमें सूरह अल-क़ियामा शब्द-दर-शब्द का अध्ययन पूरा करने की तौफीक अता की।

ऐ हमारे रब, हमारे दिलों में कयामत के दिन का पक्का यकीन पैदा कर। हमें दुनिया की जल्दबाज़ी वाली मोहब्बत से बचा और आखिरत की तैयारी करने की तौफीक दे। हमें उन खुशकिस्मत लोगों में शामिल कर जिनके चेहरे उस दिन तरोताज़ा और चमकते हुए होंगे, और जो अपने रब का दीदार करेंगे। ऐ अल्लाह, मौत की सख्ती को हम पर आसान फरमा और हमें उस दिन की रुसवाई से महफूज़ रख जब कोई किसी के काम न आएगा।

इस शब्द-दर-शब्द अध्ययन को हमारे दिलों के लिए शिफा (उपचार) बना और इसे हमारे लिए एक ऐसा प्रकाश बना जो हमारे जीवन के हर कदम का मार्गदर्शन करे। आमीन।

सूरह अल-क़ियामा का शब्द-दर-शब्द विश्लेषण कैसे काम करता है

मानक अनुवादों के विपरीत जो आपको एक वाक्य का सामान्य अर्थ देते हैं, यह पृष्ठ एक अद्वितीय “पूर्ण संदर्भ” विधि का उपयोग करता है। हम यह सुनिश्चित करने के लिए डेटा को दो अलग-अलग परतों में प्रदर्शित करते हैं ताकि आप सूरह अल-क़ियामा के प्रवाह को कभी न खोएं:

  • शीर्ष पंक्ति (संदर्भ): सूरह के समग्र संदेश और कथा को समझने के लिए पूर्ण अरबी आयत के साथ पूर्ण हिंदी अनुवाद पढ़ें।
  • निचली पंक्ति (विश्लेषण): अनुक्रम में हर एक शब्द का सटीक अर्थ, वर्तनी और मूल प्रकार देखने के लिए शब्द-दर-शब्द विवरण में उतरें।

सूरह अल-क़ियामा के लिए रंगकोडित व्याकरण गाइड को समझना

पढ़ते समय सहज रूप से कुरान की अरबी व्याकरण (नह्व और सर्फ) सीखें। यह संसाधन जटिल पाठ्यपुस्तक नियमों को तत्काल दृश्य संकेतों से बदल देता है। सूरह अल-क़ियामा का प्रत्येक शब्द एक इंटरैक्टिव “व्याकरण कार्ड” के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें तत्काल रंग-कोडिंग की सुविधा है:

  • संज्ञा (इस्म): नीले रंग में चिह्नित (नाम, स्थान, वस्तुएं)।
  • क्रिया (फेल): लाल रंग में चिह्नित (कार्य, काल)।
  • अव्यय/कण (हर्फ): हरे रंग में चिह्नित (पूर्वसर्ग, जोड़ने वाले शब्द)।

यह दृश्य सहायता आपको आयतों के भीतर वाक्य संरचनाओं और शब्दों के भेदों को तुरंत पहचानने में मदद करती है, जिससे तेजी से याद रखने और समझने में सहायता मिलती है।

सूरह अल-क़ियामा का लिप्यंतरण और उच्चारण

पढ़ना शुरू करने के लिए आपको अरबी लिपि पढ़ने में धाराप्रवाह होने की आवश्यकता नहीं है। हर शब्द कार्ड पर शामिल तजवीद-अनुकूल लिप्यंतरण के साथ अपने उच्चारण को सही करें। यह ध्वन्यात्मक गाइड आपको सूरह अल-क़ियामा में चुनौतीपूर्ण शब्दों का सही उच्चारण करने में मदद करती है, ध्वनि को सीधे अर्थ से जोड़ती है।

कुरान के आँकड़े: सूरह अल-क़ियामा के माध्यम से शब्दावली बनाना

कई छात्र कुरान की विशालता से अभिभूत महसूस करते हैं, लेकिन संख्याएं साबित करती हैं कि यह प्राप्त करने योग्य है। कुरान लगभग 77,797 कुल शब्दों से बना है, फिर भी शब्दावली अत्यधिक दोहराव वाली है।

  • कुल अद्वितीय शब्द: लगभग 14,870।
  • वास्तविक शब्द आधार: केवल ~2,000 शब्द।

सूरह अल-क़ियामा को शब्द-दर-शब्द पढ़कर, आप इस अध्याय में पाए जाने वाले आवश्यक शब्दों को सीख रहे हैं। चूंकि ये शब्द पूरे कुरान में बार-बार दोहराए जाते हैं, इसलिए इन आयतों में शब्दावली में महारत हासिल करना सीधे पूरी पवित्र पुस्तक को समझने में योगदान देता है।

सूरह अल-क़ियामा के साथ अपनी सलाह (नमाज़) को बढ़ाएं

पांच दैनिक नमाज़ों के दौरान, एक मुस्लिम औसतन 200-250 अरबी शब्दों का पाठ करता है और दोहराता है। यदि इन शब्दों को समझा नहीं जाता है, तो मन अक्सर भटक जाता है। सूरह अल-क़ियामा को शब्द-दर-शब्द पढ़ना आपको वास्तविक समय में इस शब्दावली को पहचानने में मदद करता है। जब आप प्रार्थना के लिए खड़े होते हैं और इस सूरह की आयतों का पाठ करते हैं, तो आप आखिरकार समझ पाएंगे कि आप अपने निर्माता से क्या कह रहे हैं, जिससे यह प्राप्त होगा:

  1. खुशू (एकाग्रता): सलाह ۔
  2. गुणवत्ता: इबादत की उच्च आध्यात्मिक गुणवत्ता।
  3. जुड़ाव: पाठ (तिलावत) ۔
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